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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाहित पुरुष के पक्ष में अहम फैसला सुनाया

IBN24 Desk: रायपुर (छत्तीसगढ़) छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विवाहित पुरुष के पक्ष में अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय एस अग्रवाल ने कहा अगर महिला को पहले से पता हो कि पुरुष शादीशुदा है और उसके साथ संबंध बनाती है, तो बाद में वह उस पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने या धोखाधड़ी का आरोप नहीं लगा सकती।

हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ निचली अदालत से आरोपी को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। साथ ही महिला की अपील को खारिज कर दी है। इस मामले में महिला ने खुद पैरवी की।

डोंगरगढ़ की रहने वाली महिला ने अनुसार उसकी शादी 8 मई 2008 को महेश गंजीर के साथ हुई थी और 21 जनवरी 2009 को शादी का इकरारनामा भी तैयार किया गया था। महिला का दावा था कि इसके बाद दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे थे। इस दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध भी बने।

महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उसने अलग-अलग यात्राओं पर 85 हजार रुपए खर्च किए, लेकिन जब उसने और पैसे देने से मना किया तो पति महेश ने उसे घर से निकाल दिया, जिसके बाद महिला ने महेश पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगाते हुए निचली अदालत में मामला पेश किया था।

निचली अदालत ने आरोपी को किया बरी

कोर्ट ने पाया कि महिला के दावों में कई विरोधाभास थे। रिकॉर्ड के अनुसार महिला की ओर से पहले दिए गए नोटिस और पुलिस शिकायत में शादी की निश्चित तारीख का जिक्र नहीं था, बल्कि उसमें केवल यह कहा गया था कि आरोपी ने शादी के बहाने मई से सितंबर 2008 के बीच शारीरिक संबंध बनाए।

इसके अलावा महिला के एक अन्य नोटिस से यह स्पष्ट होता है कि वह अच्छी तरह जानती थी कि महेश पहले से शादीशुदा है। महिला को उसकी पहली पत्नी का नाम भी पता था। लिहाजा कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया।

पहली पत्नी जीवित, इसलिए धोखाधड़ी नहीं

महिला ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। केस की सुनवाई के दौरान अपील करने वाली महिला ने खुद पैरवी की। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि आईपीसी की धारा 493 के तहत अपराध का मुख्य तत्व धोखाधड़ी है, जिसमें पुरुष महिला को यह विश्वास दिलाता है कि वह उसकी वैध पत्नी है।

जब महिला और पुरुष दोनों को पता हो कि वे कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं। पुरुष की जीवित पत्नी है तो धोखाधड़ी का सवाल ही नहीं उठता। क्योंकि महिला को महेश के विवाहित होने की जानकारी थी, इसलिए कोर्ट ने माना कि शादी का इकरारनामा हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 के तहत पहले ही शून्य था।

 

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