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करमा तिहार हमारी समृद्ध संस्कृति, परंपरा और प्रकृति संरक्षण का प्रतीक : मुख्यमंत्री विष्णु देव साय

IBN24 Desk: रायपुर (छत्तीसगढ़) करमा तिहार हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपरा, आस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का अनुपम प्रतीक है। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने के साथ प्रकृति के संरक्षण, सामाजिक एकता और सामूहिकता का संदेश देता है। बदलते समय के बीच कंवर समाज ने अपनी सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और रीति-रिवाजों को सहेजकर नई पीढ़ी के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहना ही किसी समाज की वास्तविक शक्ति है।मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने आज राजधानी रायपुर के बलवीर सिंह जुनेजा इंडोर स्टेडियम में छत्तीसगढ़ प्रदेश कंवर समाज युवा प्रभाग महानगर इकाई द्वारा आयोजित भव्य करमा परब महोत्सव को संबोधित करते हुए यह बात कही।

मुख्यमंत्री श्री साय ने पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया और करमा तिहार की खुशियां समाजजनों के साथ साझा कीं। उन्होंने भादो एकादशी व्रत एवं करमा तिहार की सभी समाजजनों और प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।

मुख्यमंत्री श्री साय ने इस अवसर पर कंवर समाज के लिए कोरबा जिले के मड़वारानी में सामाजिक भवन निर्माण हेतु 50 लाख रुपए, राजधानी रायपुर के टाटीबंध में सामाजिक भवन के लिए 25 लाख रुपए तथा कांकेर के ग्राम जेफरा में सांस्कृतिक मंच के लिए 15 लाख रुपए देने की घोषणा की। इसके साथ ही उन्होंने राजधानी रायपुर में प्रतिवर्ष करमा महोत्सव के आयोजन के लिए 10 लाख रुपए देने की घोषणा की। मुख्यमंत्री ने इस भव्य आयोजन के लिए कंवर समाज युवा प्रभाग और सभी सामाजिक पदाधिकारियों की सराहना की।

प्रकृति और मानव जीवन के अटूट संबंध का उत्सव है करमा तिहार

मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि करमा तिहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के बीच अटूट संबंध का उत्सव है। इस पर्व में करम डार की पूजा की जाती है। समाज के बेटे-बेटियां श्रद्धा और आस्था के साथ उपवास रखकर विधि-विधान से करम डार की पूजा-अर्चना करते हैं। रात्रि जागरण में पारंपरिक करमा गीत और नृत्य उत्सव में उल्लास भरते हैं। अगले दिन करम डार के विसर्जन के पश्चात व्रत का पारण किया जाता है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा प्रकृति के प्रति हमारी श्रद्धा, विश्वास और संरक्षण की भावना को अभिव्यक्त करती है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को कभी केवल संसाधन नहीं माना, बल्कि उसे जीवन का आधार और हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग माना है। जल, जंगल और जमीन के साथ हमारा रिश्ता केवल आवश्यकता का नहीं, बल्कि आस्था और आत्मीयता का भी है। करमा तिहार जैसी परंपराएं इसी संबंध को पीढ़ी-दर-पीढ़ी मजबूत करती आई हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रकृति संरक्षण की इसी भावना को ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के माध्यम से व्यापक जनअभियान का स्वरूप दिया है। देशभर में बड़ी संख्या में नागरिक इससे जुड़कर पौधरोपण और पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत पौधरोपण को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और सुरक्षित पर्यावरण देना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

संस्कृति के संरक्षण के साथ शिक्षा और सामाजिक सुधार भी जरूरी

मुख्यमंत्री श्री साय ने कंवर समाज में शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता की सराहना करते हुए कहा कि समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के साथ शिक्षा और सामाजिक सुधार की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। विशेष रूप से नशामुक्ति को लेकर समाज के भीतर हो रही सार्थक पहल सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है।

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