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सरीफाबाद में 1978 में मिले पट्टों पर सवाल, किसानों की जमीन दूसरे के नाम दर्ज होने के आरोप; खसरा 323 की बिक्री को जांच रिपोर्ट में अनुचित बताया, अब कार्रवाई का इंतजार

IBN24 Desk:महासमुंद/पिथौरा (छत्तीसगढ़)। जिस जमीन से गरीब किसान अपने परिवार का पेट पालते हैं, उसी जमीन को बचाने के लिए उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। महासमुंद जिले के ग्राम सरीफाबाद में काबिल काश्त भूमि के कथित फर्जी हस्तांतरण और खरीद-बिक्री का मामला अब राजस्व व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आरोप हैं कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित हेरफेर कर किसानों की जमीन दूसरे लोगों के नाम दर्ज की गई और फिर उसकी बिक्री कर दी गई। मामला यहीं नहीं थमा—खसरा नंबर 323 की 1.65 हेक्टेयर जमीन को लेकर जांच प्रतिवेदन में उसे शासकीय तालाब बताते हुए क्रय-विक्रय को अनुचित माना गया है। इसके बावजूद किसानों को अब तक ठोस कार्रवाई और न्याय का इंतजार है।

दस्तावेज किसानों के पास, जमीन दूसरे के नाम कैसे?

ग्रामीणों के अनुसार, वर्ष 1978 में शासन ने किसानों को खेती और आजीविका के लिए जमीन दी थी। किसान दशकों से इन जमीनों पर खेती करते आ रहे हैं। धनसाय का दावा है कि उसे 2 एकड़ 15 डिसमिल जमीन मिली थी, जिसका खसरा नंबर 327 है। उसके पास ऋण पुस्तिका होने के बावजूद जमीन रायपुर के निखिल अग्रवाल के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। किसान गोपीचंद का कहना है कि उसके पिता पदमनाथ को मिली लगभग दो एकड़ जमीन, खसरा नंबर 328, भी अब निखिल अग्रवाल के नाम दर्ज है।किसानों ने आरोप लगाया है कि जमीन बेचने के लिए दबाव बनाया गया और इनकार करने पर कथित तौर पर ‘त्रुटि सुधार’ के माध्यम से राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव कराए गए। तत्कालीन पटवारी राजेंद्र डोंगरे और कुछ अन्य लोगों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। ग्रामीणों ने विधायक संपत अग्रवाल के प्रतिनिधि पुरुषोत्तम धृतलहरे को लेकर भी आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना बाकी है।

कलेक्टर का पत्र, फिर भी रजिस्ट्री होने का आरोप

किसानों के अनुसार, उन्होंने 19 जनवरी 2026 को कलेक्टर से शिकायत की थी। इसके बाद 2 फरवरी 2026 को विवादित जमीन की रजिस्ट्री रोकने के संबंध में एसडीएम पिथौरा और उप पंजीयक को पत्र जारी किया गया। इसके बावजूद 16 फरवरी 2026 को दो रजिस्ट्रियां होने का आरोप है। उप पंजीयक मोहम्मद कासिम रजा ने अपने पक्ष में कहा था कि वे ऑनलाइन दस्तावेज देखकर रजिस्ट्री करते हैं और उनके पास रजिस्ट्री रोकने संबंधी पत्र नहीं आया था। ऐसे में सवाल है कि कलेक्टर कार्यालय से जारी पत्र संबंधित कार्यालय तक पहुंचा या नहीं? यदि पहुंचा था, तो उसके बाद पंजीयन कैसे हुआ? इसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।

तालाब की जमीन निजी नाम पर, जांच रिपोर्ट में गंभीर टिप्पणी

मामले का सबसे गंभीर पहलू खसरा नंबर 323, रकबा 1.65 हेक्टेयर है। राजस्व निरीक्षक मंडल सांकरा की 1 अक्टूबर 2026 की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पुराने राजस्व अभिलेखों और मिसल बंदोबस्त 1986-87 में जमीन तालाब/शासकीय भूमि के रूप में दर्ज पाई गई। मौके पर पानी भरा होने और ग्रामीणों द्वारा निस्तारी के लिए उपयोग किए जाने की बात भी रिपोर्ट में दर्ज है। जांच प्रतिवेदन में कहा गया कि मौके पर तालाब के रूप में मौजूद शासकीय भूमि को पट्टे में दर्ज किया जाना उचित नहीं था। रिपोर्ट में जमीन के क्रय-विक्रय को अनुचित मानते हुए बिक्री शून्य करने और उसे पुनः शासकीय भूमि की ‘पानी के नीचे (तालाब)’ मद में दर्ज करने की अनुशंसा की गई है। वर्तमान रिकॉर्ड में खरीदार निखिल अग्रवाल का नाम दर्ज होने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है। हालांकि, अनुशंसा के बाद अंतिम आदेश और आगे की कानूनी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

पटवारी पर आरोप, अधिकारियों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

ग्रामीणों का आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी के कारण उनकी जमीन दूसरे लोगों के नाम पहुंच गई। कुछ किसानों ने संबंधित कर्मचारियों और जमीन कारोबारियों के बीच मिलीभगत की आशंका भी जताई है। इन आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। सवाल यह भी है कि जब शिकायतें कलेक्टर तक पहुंचीं, तब विवादित जमीनों के दस्तावेजों, नामांतरण आदेशों, त्रुटि सुधार आवेदनों और रजिस्ट्री की प्रक्रिया का पूरा सत्यापन क्यों नहीं हो पाया?

सरीफाबाद का मामला अब सिर्फ जमीन विवाद नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही की परीक्षा है। गरीब किसान अपनी जमीन बचाने के लिए दफ्तरों की चौखट पर भटकें और सरकारी तालाब की जमीन के निजी नाम पर दर्ज होने की जांच रिपोर्ट के बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट न हो—तो सवाल उठना लाजिमी है।

अब प्रशासन को बताना होगा कि किसानों की जमीन का वास्तविक मालिकाना हक कैसे बहाल होगा, कथित गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही कब तय होगी और सरकारी तालाब की जमीन पर जांच रिपोर्ट के अनुरूप कार्रवाई कब होगी। किसानों को केवल जांच के आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध निर्णय और न्याय चाहिए। आखिर गरीब किसान कब तक अपनी ही जमीन के लिए लड़ता रहेगा?

 

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