IBN24 Desk: लैलूंगा (छत्तीसगढ़) विकासखंड लैलूंगा क्षेत्र में इन दिनों लाल ईंट निर्माण के नाम पर पर्यावरण और कानून दोनों को खुलेआम चुनौती दी जा रही है। बिना वैध अनुमति संचालित हो रहे ईंट भट्टों की आग में जहां जंगलों की हरियाली स्वाहा हो रही है, वहीं कृषि भूमि का बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन कर धरती का सीना छलनी किया जा रहा है। हैरत की बात यह है कि पूरे मामले की जानकारी होने के बावजूद राजस्व विभाग, वन विभाग, खनिज विभाग और पुलिस प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
बिना अनुमति धड़ल्ले से चल रहे भट्टे
क्षेत्र के विभिन्न ग्रामों में लाल ईंट निर्माण के लिए संचालित कई भट्टों के पास आवश्यक अनुमति और दस्तावेज होने को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि नियम-कायदों को ताक पर रखकर बड़े पैमाने पर ईंट निर्माण किया जा रहा है। प्रशासनिक अमला सब कुछ देखकर भी अनदेखा कर रहा है, जिससे अवैध कारोबारियों के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।
जंगलों पर सबसे बड़ा हमला
ईंट पकाने के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ियों की आवश्यकता होती है। आरोप है कि इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए आसपास के जंगलों से लगातार पेड़ों की कटाई की जा रही है। हरे-भरे वृक्षों को काटकर भट्टों में झोंका जा रहा है, जिससे वन संपदा को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि प्रतिदिन जंगलों से लकड़ियों की ढुलाई होती है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती हैं। कई ग्रामीणों ने तो यहां तक कहा कि खनिज और संबंधित विभागों के अधिकारी क्षेत्र में शायद ही कभी दिखाई देते हैं।
कृषि भूमि का हो रहा अवैध दोहन
लाल ईंट निर्माण के लिए उपजाऊ कृषि भूमि से कई फीट गहराई तक मिट्टी निकाली जा रही है। इससे खेतों की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है और भविष्य में कृषि उत्पादन पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। किसानों का कहना है कि जहां एक ओर सरकार खेती को बढ़ावा देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कृषि भूमि का अवैध उत्खनन खुलेआम जारी है।
केंद्र सरकार की अधिसूचना का भी उल्लंघन
भारत सरकार द्वारा राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना के अनुसार ताप विद्युत संयंत्रों के 300 किलोमीटर के दायरे में कृषि भूमि की मिट्टी का उपयोग कर लाल ईंट निर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद क्षेत्र में कृषि भूमि से मिट्टी निकालकर ईंट निर्माण किए जाने के आरोप गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। यदि यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह केवल पर्यावरणीय अपराध ही नहीं बल्कि सरकारी नियमों की खुली अवहेलना भी है।
हरियाली बचाने के दावों की खुल रही पोल
सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर वृक्षारोपण अभियान चला रही है। “पेड़ लगाओ, पर्यावरण बचाओ” जैसे संदेशों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई दे रही है। एक ओर पौधे लगाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर ईंट भट्टों की आग में हजारों पेड़ जलाए जा रहे हैं।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में क्षेत्र का पर्यावरणीय संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित होगा। भू-क्षरण, जल स्तर में गिरावट और बढ़ते प्रदूषण जैसी समस्याएं विकराल रूप ले सकती हैं।
वन विभाग की भूमिका पर उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि बिना विभागीय संरक्षण के इतने बड़े स्तर पर अवैध गतिविधियां संभव नहीं हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवाल वन विभाग सहित संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न अवश्य लगा रहे हैं।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी चर्चा में
क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की खामोशी भी लोगों को खटक रही है। पर्यावरण और कृषि भूमि से जुड़े इतने गंभीर मुद्दे पर अब तक किसी बड़े जन आंदोलन या प्रभावी हस्तक्षेप का अभाव लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इस पूरे मामले पर जिम्मेदार जनप्रतिनिधि मौन क्यों हैं।
“ईंट भट्टों की आग में जल रहा आने वाला कल”
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते अवैध ईंट भट्टों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। जंगल खत्म होंगे, कृषि भूमि बंजर होगी और पर्यावरण प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संबंधित विभाग इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे या फिर लाल ईंट के इस काले खेल की आग यूं ही धधकती रहेगी?
जनता के सवाल
– क्या अवैध ईंट भट्टों को किसी का संरक्षण प्राप्त है?
– बिना अनुमति संचालित भट्टों पर कार्रवाई कब होगी?
– जंगलों की कटाई रोकने के लिए जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे हैं?
– कृषि भूमि के अवैध उत्खनन की जांच कौन करेगा?
– क्या कानून केवल आम लोगों के लिए है या प्रभावशाली लोगों पर भी लागू होगा?
लैलूंगा की जनता अब जवाब चाहती है। क्योंकि यह केवल ईंट निर्माण का मामला नहीं, बल्कि जंगल, जमीन, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
