IBN24 Desk: अबूझमाड़ (छत्तीसगढ़) कभी नमक, तेल और राशन खरीदने के लिए अबूझमाड़ के ग्रामीणों को 30 से 40 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता था। संकरी पगडंडियों, ऊंची पहाड़ियों और घने जंगलों को पार कर वे पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के भामरागढ़ पहुंचते थे। सुबह अंधेरा रहते घर से निकलने वाले ग्रामीण देर रात लौटते थे। कई बार जंगल में ही रात बितानी पड़ती थी।
यह मजबूरी इसलिए थी, क्योंकि उनके अपने इलाके में न सड़क थी, न बाजार और न ही कोई व्यापारी पहुंचने की हिम्मत करता था। आज तस्वीर बदल चुकी है। देश की आजादी के करीब 8 दशक बाद, छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 26 साल बाद और नक्सलवाद के खत्म होने के बाद पहली बार अबूझमाड़ के पद्मकोट, जाटलूर में नियमित हाट बाजार लगना शुरू हुआ है।
इससे आसपास के उसेबेड़ा, परपा, बोड़तामरका, कोड़तामरका, दुरबेड़ा समेत 20 से 25 गांवों के 5 हजार से अधिक ग्रामीणों को अब अपने ही इलाके में राशन, सब्जी, कपड़े और रोज की जरूरतों का सामान मिलने लगा है।
भी नक्सलियों की राजधानी कहा जाता था यह इलाका
पदमकोट और आसपास का इलाका कभी नक्सलियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था। इसे नक्सलियों की राजधानी तक कहा जाता था। यहां बाहरी लोगों की एंट्री लगभग प्रतिबंधित थी। ग्रामीण बताते हैं कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति गलती से भी इस इलाके में पहुंच जाता था तो उसे नक्सली पकड़ लेते थे।
व्यापारी यहां आने की सोच भी नहीं सकते थे। नक्सलियों का खौफ, बारूदी सुरंगों का डर और विकास कार्यों पर रोक ने इस पूरे इलाके को दशकों तक देश की मुख्यधारा से अलग रखा। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और बाजार जैसी सामान्य सुविधाएं भी यहां सपना थीं।
तेल-नमक खरीदना भी किसी अभियान से कम नहीं था
अबूझमाड़ के कई गांवों में रहने वाले लोगों के लिए बाजार जाना किसी सामान्य काम की तरह नहीं, बल्कि एक अभियान की तरह होता था। अलग-अलग गांवों के ग्रामीण तय दिन पर इकट्ठा होते थे। लगभग हर परिवार से एक सदस्य सुबह 5-6 बजे निकलता था।
घंटों पैदल चलने के बाद महाराष्ट्र पहुंचते, जरूरत का सामान खरीदते और फिर रात 9-10 बजे तक घर लौटते थे। बरसात के दिनों में यह सफर और भी कठिन हो जाता था। कई बार नदी-नाले उफान पर होते थे और जंगलों में रात बितानी पड़ती थी। नमक, तेल और राशन जैसी सामान्य चीजें भी यहां के लोगों के लिए संघर्ष का प्रतीक थीं।
