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भू-अर्जन मुआवजा विवाद ने पकड़ा तूल, मंत्री से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक गूंजा किसानों का दर्द

IBN24 Desk: घरघोड़ा (छत्तीसगढ़) धरमजयगढ़ क्षेत्र के ग्राम कुर्मीभौंना, पोरडा और पोरडी में प्रस्तावित कोल परियोजना को लेकर मुआवजा विवाद अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। भू-प्रभावित ग्रामीणों की आवाज अब सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुकी है। पहले वित्त मंत्री, फिर राजस्व मंत्री और अब विधानसभा अध्यक्ष तक ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा पहुंचाई है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2007 में तय की गई मुआवजा दरों को आज वर्ष 2026 में भी लागू किया जा रहा है, जबकि जमीन की कीमतें कई गुना बढ़ चुकी हैं। प्रभावितों का कहना है कि सरकार और कंपनियां “विकास” की बात तो कर रही हैं, लेकिन जिन किसानों की जमीन जा रही है, उनके भविष्य पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा।

📄 “6-8-10 लाख में अब जमीन नहीं मिलती”

ग्रामीणों के मुताबिक वर्तमान नीति के तहत —
▪️ असिंचित भूमि : ₹6 लाख प्रति एकड़
▪️ अर्धसिंचित भूमि : ₹8 लाख प्रति एकड़
▪️ सिंचित भूमि : ₹10 लाख प्रति एकड़

मुआवजा निर्धारित है, जबकि क्षेत्र में जमीन का बाजार मूल्य ₹20 से ₹25 लाख प्रति एकड़ या उससे भी अधिक बताया जा रहा है।

⚠️ ग्रामीणों का सवाल — “क्या 2007 में तय रकम से 2026 में परिवार बस पाएगा?”

ज्ञापन में प्रभावित परिवारों ने साफ कहा है कि इतने कम मुआवजे में नई जमीन खरीदना, घर बसाना और बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना लगभग असंभव है।

📞 राजस्व मंत्री ने कलेक्टर को किया फोन

ग्रामीणों द्वारा ज्ञापन सौंपे जाने के बाद छत्तीसगढ़ के राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने संबंधित जिले के कलेक्टर से फोन पर चर्चा की। सूत्रों के अनुसार कलेक्टर ने मंत्री को बताया कि मुआवजा दरों में बदलाव केवल राज्य सरकार स्तर पर ही संभव है।

इस पर मंत्री ने संकेत दिया कि यह मामला आगामी कैबिनेट बैठक का प्रमुख विषय बन सकता है।

🏛️ विधानसभा अध्यक्ष भी हुए गंभीर

मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया जब भू-प्रभावित ग्रामीणों ने छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह से मुलाकात कर पूरी स्थिति बताई।

ग्रामीणों ने जब बताया कि “2007 में तय मुआवजा दरों” पर वर्ष 2026 में भुगतान की तैयारी है, तो विधानसभा अध्यक्ष ने तत्काल गंभीरता दिखाते हुए मुख्यमंत्री के नाम रीमार्क कर आवेदन अग्रेषित कर दिया।

📝 हस्तलिखित नोट्स में भी झलका ग्रामीणों का दर्द

ग्रामीणों द्वारा सौंपे गए हस्तलिखित नोट्स में “2007 की न्यूनतम राशि”, “6-8-10 लाख की दर” और “विस्थापितों के भविष्य” को लेकर गहरी चिंता दर्ज की गई है। ग्रामीणों ने स्पष्ट लिखा कि वर्तमान दरों पर पुनर्वास संभव नहीं है।

🔥 अब बड़ा सवाल — विकास या विस्थापन?

तीनों गांवों के सैकड़ों परिवारों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है। कई इलाकों में 100 प्रतिशत भू-अधिग्रहण की स्थिति बनने की बात सामने आई है।

लगातार मंत्रियों और विधानसभा अध्यक्ष तक पहुंचे इस मुद्दे ने प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। अब नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार 19 साल पुरानी मुआवजा नीति में बदलाव करेगी, या फिर भू-प्रभावित परिवारों का संघर्ष और उग्र रूप लेगा।

 

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