शिकायत जांच में पटवारी राजेंद्र डोंगरे से मिलीभगत का आरोप, जांच में बिक्री को अनुचित मानते हुए शासकीय भूमि दर्ज करने की अनुशंसा।
IBN24 Desk: रायपुर (छत्तीसगढ़)महासमुंद। सरीफाबाद की सरकारी जमीन को निजी हाथों में पहुंचाने का मामला अब राजस्व विभाग की जांच रिपोर्ट के बाद और गंभीर हो गया है। ग्राम सरीफाबाद के खसरा नंबर 323, रकबा 1.65 हेक्टेयर की जमीन को राजस्व अभिलेखों, मिसल बंदोबस्त 1986-87 और मौके की स्थिति में तालाब/शासकीय भूमि के रूप में दर्ज पाया गया है। इसके बावजूद जमीन का क्रय-विक्रय हुआ और वर्तमान राजस्व अभिलेख में खरीदार निखिल अग्रवाल का नाम दर्ज होने की बात जांच रिपोर्ट में सामने आई है। मामले में राजस्व निरीक्षक, रा.नि.मं. सांकरा, तहसील पिथौरा द्वारा 1 अक्टूबर 2026 को प्रस्तुत विस्तृत जांच प्रतिवेदन ने पूरे मामले को कई गंभीर सवालों के घेरे में ला दिया है। जांच में मौके पर खसरा नंबर 323 की जमीन में पानी भरा होना और ग्रामीणों द्वारा लंबे समय से उसका तालाब के रूप में निस्तारी कार्यों में उपयोग किया जाना पाया गया।
सरकारी पट्टे की जमीन आखिर निजी खरीदी-बिक्री तक कैसे पहुंची?
जांच रिपोर्ट के अनुसार पुराने अभिलेखों में उक्त जमीन तालाब के रूप में दर्ज है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि पुराने खसरा नंबर 214/7 की शासकीय भूमि बाद में पट्टे में दर्ज हुई और उसका नया खसरा नंबर 323 बना। जांच अधिकारी ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि पट्टा प्रदान करते समय मौके का मिलान नहीं किया गया, जिसके कारण मौके पर तालाब के रूप में मौजूद शासकीय भूमि पट्टे में चली गई, जो उचित प्रतीत नहीं होता। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जमीन अभिलेखों और मौके पर तालाब के रूप में मौजूद थी, तो फिर उसका पट्टा, नामांतरण और उसके बाद क्रय-विक्रय कैसे होता चला गया?
निखिल अग्रवाल का नाम बार-बार क्यों? इस पूरे प्रकरण में खरीदार निखिल अग्रवाल का नाम भी महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया है। जांच रिपोर्ट में बताया गया है कि विक्रेता योगेश कुमार साहू के नाम दर्ज भूमि का पंजीयन उप पंजीयक कार्यालय पिथौरा में हुआ और इसके बाद वर्तमान राजस्व अभिलेख में खरीदार निखिल अग्रवाल का नाम दर्ज है। शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि जब जमीन सरकारी तालाब और निस्तारी उपयोग की थी, तो ऐसी जमीन की रजिस्ट्री किस आधार पर हुई? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि सरकारी पट्टे की जमीन को खरीदने वाले व्यक्ति के नाम राजस्व रिकॉर्ड में प्रविष्टि किस प्रक्रिया के तहत हुई?
पटवारी राजेंद्र डोंगरे की भूमिका पर भी सवाल
मामले में तत्कालीन,संबंधित पटवारी राजेंद्र डोंगरे की भूमिका को लेकर भी शिकायत में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में आरोप है कि पटवारी को जमीन की वास्तविक स्थिति और तालाब के रूप में दर्ज होने की जानकारी होने के बावजूद राजस्व दस्तावेजों में हेरफेर कर जमीन को निजी लेनदेन तक पहुंचाने में सहयोग किया गया। जांच रिपोर्ट में यह जरूर सामने आया है कि संबंधित पटवारी के पास उपलब्ध राजस्व अभिलेखों और मिसल बंदोबस्त का परीक्षण किया गया था तथा जमीन की तालाब संबंधी स्थिति अभिलेखों में दर्ज थी। ऐसे में पटवारी की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच की जरूरत और बढ़ गई है।
जांच रिपोर्ट ने बिक्री को माना अनुचित,जांच रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि मौके पर खसरा नंबर 323 की जमीन तालाब के रूप में मौजूद है, किसी का कब्जा नहीं पाया गया और ग्रामीण इसका उपयोग निस्तारी के लिए करते हैं। रिपोर्ट में शासकीय पट्टे पर प्राप्त ऐसी भूमि, जिस पर पट्टाधारी का कृषि कब्जा नहीं रहा और जो मौके पर तालाब है, उसका क्रय-विक्रय उचित नहीं माना गया है। जांच अधिकारी ने क्रय-विक्रय को शून्य करते हुए जमीन को शासकीय भूमि की ‘पानी के नीचे (तालाब)’ मद में दर्ज किया जाना उचित बताया है।
अब सवाल यह है कि जब राजस्व विभाग की जांच में जमीन की वास्तविकता सामने आ चुकी है, तो निखिल अग्रवाल के नाम हुई प्रविष्टि और कथित रजिस्ट्री पर क्या कार्रवाई होगी? साथ ही जमीन को तालाब से निजी भूमि में बदलने की प्रक्रिया में शामिल रहे राजस्व कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय होगी या नहीं, यह भी प्रशासन के लिए बड़ा सवाल है। सरकारी तालाब की जमीन का निजी सौदा सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड और सरकारी भूमि की सुरक्षा पर गंभीर सवाल है।
